इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माफिया अतीक अहमद के बेटे अबान की आखिरी विदाई में शामिल होने की ख्वाहिश पर बंदी भाईयो को दी कस्टडी पैरोल की अनुमति
8/08/26 लखनऊ:- इंसानी रिश्तों की अहमियत और न्याय व्यवस्था में मानवीय संवेदनाओं की मिसाल पेश करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा आदेश दिया है, जिसकी हर ओर चर्चा हो रही है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को अपने सगे भाई की अंतिम विदाई और धार्मिक रस्मों में शामिल होने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामला उस समय सामने आया, जब न्यायिक अभिरक्षा में बंद दो भाइयों के सामने अपने ही भाई की मौत के बाद आखिरी बार उसे विदा करने की पीड़ा खड़ी हो गई। जेल की सलाखों के पीछे होने के कारण दोनों भाई अपने
इस दुख भरे समय में शामिल नहीं हो पा रहे थे। इसके बाद उन्होंने न्याय की चौखट पर दस्तक दी और अपने दिवंगत भाई के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति मांगी.
‘परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़’
इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल याचिका Criminal Misc. Writ Petition No. 19356 of 2026 (Parveen Qureshi बनाम State of U.P. व अन्य) में बताया गया कि मोहम्मद उमर और अली अहमद न्यायिक अभिरक्षा में अलग-अलग जेलों में निरुद्ध हैं। इसी बीच उनके भाई अबान अहमद का निधन हो गया।
भाई के निधन की खबर ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। ऐसे समय में जब परिवार को अपनों के साथ की जरूरत थी, दोनों भाई जेल में होने के कारण अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने अदालत से गुहार लगाई कि उन्हें कुछ समय के लिए अपने भाई की अंतिम विदाई में शामिल होने का अवसर दिया जाए, ताकि वे धार्मिक परंपराओं और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी पूरी कर सकें।

‘हाईकोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनी दोनों भाइयों की बात’
मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संवेदनशीलता दिखाते हुए दोनों बंदियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बातचीत की। अदालत ने उनकी भावनाओं को समझा और उनसे अंतिम संस्कार में शामिल होने की इच्छा के बारे में जानकारी ली।
दोनों बंदियों ने न्यायालय के सामने अपने दिवंगत भाई को अंतिम विदाई देने की इच्छा जताई। उन्होंने बताया कि परिवार के इस कठिन समय में उनकी मौजूदगी बेहद जरूरी है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से भी इस मानवीय मांग पर कोई सिद्धांतगत आपत्ति नहीं जताई गई।
‘अदालत ने कहा- परिवार के दुख में शामिल होने का अधिकार छीना नहीं जा सकता’
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मोहम्मद उमर और अली अहमद को उनके दिवंगत भाई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा—
“Mohd. Umar and Ali Ahmad cannot be denied their rights to attend funeral rites of their deceased brother. Sinews of a nation are strengthened when the liberties of its citizens are protected.”
अर्थात, किसी भी व्यक्ति को अपने सगे भाई की अंतिम विदाई में शामिल होने के अधिकार से दूर नहीं किया जा सकता। किसी राष्ट्र की वास्तविक मजबूती तभी होती है, जब उसके नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा की जाती है।
‘आज 08 अगस्त को अंतिम संस्कार में शामिल होंगे दोनों बंदी’
हाईकोर्ट ने दोनों भाइयों को 08 अगस्त 2026 की रात 8 बजे प्रयागराज स्थित कसारी मसारी कब्रिस्तान में आयोजित अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति प्रदान की है।
हालांकि अदालत ने कानून व्यवस्था और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दोनों को पुलिस अभिरक्षा में रखने का आदेश दिया है। उन्हें जेल से सुरक्षा व्यवस्था के बीच कार्यक्रम स्थल तक ले जाया जाएगा और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने के बाद वापस संबंधित जेलों में भेज दिया जाएगा।
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डीजीपी को सुरक्षा व्यवस्था के निर्देश’
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि दोनों बंदियों की सुरक्षा के लिए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की नियुक्ति की जाए। यह अधिकारी पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगा, जिससे न्यायालय के आदेश का पालन भी हो और सुरक्षा व्यवस्था भी बनी रहे।
अदालत ने कस्टडी पैरोल देते हुए कुछ आवश्यक शर्तें भी लगाई हैं। दोनों बंदी—
किसी भी सार्वजनिक सभा को संबोधित नहीं करेंगे।
मीडिया या सोशल मीडिया से बातचीत नहीं करेंगे।
अंतिम संस्कार के अलावा किसी अन्य कार्यक्रम में भाग नहीं लेंगे।
केवल धार्मिक अनुष्ठान कराने वाले व्यक्ति और निर्धारित परिजनों से ही बातचीत करेंगे।
पुलिस और प्रशासन के सभी निर्देशों का पालन करेंगे।
न्याय के साथ संवेदना का संदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था के मानवीय चेहरे को भी सामने लाता है। अदालत ने दिखाया कि कानून का पालन करते हुए भी इंसानी भावनाओं और पारिवारिक रिश्तों की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह फैसला इस बात का संदेश देता है कि न्याय केवल नियमों और प्रक्रियाओं का नाम नहीं है, बल्कि उसमें संवेदनशीलता, करुणा और परिस्थितियों को समझने की भावना भी शामिल होती है।
जब कोई व्यक्ति अपने प्रियजन को खो देता है, तब अंतिम विदाई का अवसर उसके जीवन का बेहद भावुक पल होता है। ऐसे समय में हाईकोर्ट का यह आदेश न्याय और मानवता के सुंदर संतुलन का उदाहरण बनकर सामने आया है।